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सहकारिता के बारे में
 

सहकारी समितियां एक प्रकार का सामाजिक उद्यम होती हैं जो सदस्यों की भलाई के लिए सदस्यों के द्वारा संचालित की जाती हैं।
सहकारी समितियां आकार में छोटे भण्डार से लेकर फ़ोच्र्यून 500 कम्पनियों जितनी बड़ी हो सकती है। वास्तव में, सहकारी समितियां कृषि, मत्स्यपालन, उपभोक्ता तथा वित्तीय सेवाएं, आवास तथा उत्पादन (श्रमिक सहकारी समितियां) जैसे सभी पारंपरिक आर्थिक क्षेत्रों में स्थापित की जा सकती हैं।
दूसरे प्रतिष्ठानों से कई तरह से समान होते हुए, सहकारी समितियां कई प्रकार से विशिष्ट होती हैं, जो वास्तव में समाज और अपने सदस्यों की चिंता करती हैं।

  • स्वामित्व:सहकारी समितियों का स्वामित्व निवेशकों की अपेक्षा अपने सदस्यों के लोकतांत्रिक नियंत्रण में निहित होता है, जो सहकारी समितियों की सेवाओं का उपभोग करते हैं या उनके उत्पाद खरीदते हैं। सहकारी समितियों के सदस्य अपने सदस्यों में से ही निदेशक मण्डल का चुनाव करते हैं।
  • लाभांश:निवेश या स्वामित्व पूंजी के अनुपात की अपेक्षा अतिरिक्त राजस्व (व्यय तथा निवेश से अतिरिक्त आय) सहकारी समिति के उपयोग के अनुपात के आधार पर सदस्यों को लौटाया जाता है।
  • सामाजिक प्रभाव:ये लाभ द्वारा अभिपे्ररित न होकर, अपने सदस्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने वाली सेवाओं तथा उच्च गुणवत्ता वाली वस्तुओं तथा सेवाओं द्वारा अभिप्रेरित होती हैं। ये केवल अपने सदस्यों की सेवा के लिए अस्तित्व में आती हैं।
  • परस्पर सहायोग:सहकारी समितियां निवेश तथा आरक्षित पूंजी से प्राप्त आय पर करों का भुगतान करती हैं। सहकारी समितियों का अतिरिक्त राजस्व व्यक्तिगत रूप से सदस्यों को लौटा दिया जाता है, जो उनपर करों का भुगतान करते हैं।

सहकारी अंतर क्या है ?
सहकारी समितियां ऐसा उद्यम हैं जो पूंजी की अपेक्षा लोगों को अपने व्यवसाय के केन्द्र में रखते हैं। सहकारी समितियां ऐसी व्यवसायिक प्रतिष्ठान होती हैं जो तीन मूलभूत बातों के आधार पर पारिभाषित की जा सकती हैं। ये हैं - स्वामित्व, नियंत्रण और लाभग्रहण। सहकारी उद्यम में ही केवल ये तीन बातें सीधे उपभोक्ता के हाथ में होती हैं।

सहकारी समितियां लोगों को अपने व्यवसाय के केन्द्र में रखती हैं। ये शुद्ध लाभ अर्जन की अपेक्षा मूल्यों को महत्व देती हैं। चूंकि सहकारी समितियां अपने सदस्यों (व्यक्ति या वर्ग और यहां तक पूंजीगत उद्यम) के लोकतांत्रिक नियंत्रण के स्वामित्व में होती हैं, इसलिए सहकारी समितियों के द्वारा लिए गए निर्णय, लाभ अर्जित करने की आवश्यकता, अपने सदस्यों की आवश्यकताओं तथा समाज के व्यापक हितों में संतुलन स्थापित करते हैं।

सहकारी समितियां ऐसे उद्यम हैं जो सिद्धांतों तथा मूल्यों के समुच्चय का अनुसरण करते हैं।